अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
द्वारा अंगीकृत भगवान चित्रगुप्त जी का चित्र एवं स्तुति
जय चित्रगुप्त यमेश तव, शरणागतम् शरणागतम् । जय पूज्यपद पद्मेश तव, शरणागतम् शरणागतम् । जय देव देव दयानिधे, जय दीनबंधु कृपानिचे, कर्मेश जय धर्मेश तव, शरणागतम् शरणागतम् । जय चित्र अवतारी प्रभो, जय लेखनीधारी विभो, जय श्यामतन चित्रेश तव, शरणागतम् शरणागतम् पूर्वज व भगवत् अंश जय, कायस्थकुल अवतंस जय, जय शक्तिबुद्धिविशेष तव, शरणागतम् शरणागतम् ।। जय विज्ञ क्षत्रिय धर्म के ज्ञाता शुभाशुभ कर्म के, जय शांति न्यायाधीश तव, शरणागतम् शरणागतम् । जय दीन अनुरागी हरी, चाहे दया दृष्टि तेरी, कीजे कृपा करूणेश तव, शरणागतम् शरणागतम् ।। तव नाथ नाम प्रताप से, छुट जाय भव त्रयताप से, हो दूर सर्व क्लेश तव, शरणागतम् शरणागतम् । जय चित्रगुप्त यमेश तव, शरणागतम् शरणागतम् । जय पूज्यपद पद्मेश तव, शरणागतम् शरणागतम् ।
- कायस्थ विरादरी में आपसी एकता, भाईचारे एवं संगठन की भावना जागृत करने के साथ ही राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना विकसित करना।
- कायस्थ समाज में प्रचलित उप जाति बंधन की भावना, कुरीतियों, कुप्रथाओं और रूढ़ियों की संकीर्ण भावनाओं को समाप्त करके समान आचार संहिता तैयार कर इसे लागू करने हेतु प्रयास करना ।
- कायस्थ महापरिवार में आध्यात्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जागृति लाने हेतु पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन, विचार गोष्ठियों, व्याख्यानों और सम्मेलनों का आयोजन करना, शिक्षण संस्थानों की स्थापना करना तथा आर्थिक स्वावलंबन हेतु गैर सरकारी संस्थान, सरकारी बैंक व संस्था बनाना, उद्योगों एवं व्यापार से संबंधित समग्र क्षेत्रों में पहल करने हेतु प्रोत्साहन करना ।
- कायस्थ महापरिवार के हितों हेतु स्थापित विभिन्न संस्थानों को व्यवस्थित करना, स्थापित करना तथा पर्यवेक्षण एवं वित्तीय संस्थानों की स्थापना करना।
- कायस्थ महापरिवार के इतिहास, साहित्य एवं सांस्कतिक विरासत को सुरक्षित रखने हेतु उनका संवग्रह, शोध, प्रकाशन और समुचित कार्यवाही करना ।
- कायस्थ महापरिवार की प्रगति, विकास और सर्वांगीण उन्नति हेतु ऐसे वे सभी कार्य करना और कराना जो यथासमय आवश्यक प्रतीत हो।
- संगठन, संघर्ष और स्वावलंबन के आधार पर समाज में एकात्म भाव, एकता, भाईचारा, प्रेम, सौहार्द्र व अपने अधिकारों के प्रति जागृत और चेतना पैदा कर समाज को समृद्ध, समुन्नत करना, उसके प्राचीन गौरव को पुनस्र्थापित करना और समाज में स्वावलंबन का भाव निर्मित करना।
- इस हेतु समाज के प्रत्येक भाई बहिन में संगठन हेतु समर्पण का जज्बा पैदा करना, अधिकारों की सुरक्षा हेतु संघर्ष के लिए साहस का भाव जागृत करना और स्वावलंबी समाज निर्माण हेतु आपस में सहयोगपूर्ण वातावरण का निर्माण करना ।
- कायस्थ विरादरी में आपसी एकता, भाईचारे एवं संगठन की भावना जागृत करने के साथ ही राष्ट्रीय एकता,अखण्डता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना विकसित करना।
- कायस्थ समाज में प्रचलित उप जाति बंधन की भावना, कुरीतियों, कुप्रथाओं और रूढ़ियों की संकीर्ण भावनाओं को समाप्त करके समान आचार संहिता तैयार कर इसे लागू करने हेतु प्रयास करना ।
- कायस्थ महापरिवार में आध्यात्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक जागृति लाने हेतु पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन, विचार गोष्ठियों, व्याख्यानों और सम्मेलनों का आयोजन करना, शिक्षण संस्थानों की स्थापना करना तथा आर्थिक स्वावलंबन हेतु गैर सरकारी संस्थान, सरकारी बैंक व संस्था बनाना, उद्योगों एवं व्यापार से संबंधित समग्र क्षेत्रों में पहल करने हेतु प्रोत्साहन करना ।
- कायस्थ महापरिवार के हितों हेतु स्थापित विभिन्न संस्थानों को व्यवस्थित करना, स्थापित करना तथा पर्यवेक्षण एवं वित्तीय संस्थानों की स्थापना करना।
- कायस्थ महापरिवार के इतिहास, साहित्य एवं सांस्कतिक विरासत को सुरक्षित रखने हेतु उनका संवग्रह, शोध, प्रकाशन और समुचित कार्यवाही करना ।
कायस्थ महापरिवार की प्रगति, विकास और सर्वांगीण उन्नति हेतु ऐसे वे सभी कार्य करना और कराना जो यथासमय आवश्यक प्रतीत हो।
संगठन, संघर्ष और स्वावलंबन के आधार पर समाज में एकात्म भाव, एकता, भाईचारा, प्रेम, सौहार्द्र व अपने अधिकारों के प्रति जागृत और चेतना पैदा कर समाज को समृद्ध, समुन्नत करना, उसके प्राचीन गौरव को पुनस्र्थापित करना और समाज में स्वावलंबन का भाव निर्मित करना।
- इस हेतु समाज के प्रत्येक भाई बहिन में संगठन हेतु समर्पण का जज्बा पैदा करना, अधिकारों की सुरक्षा हेतु संघर्ष के लिए साहस का भाव जागृत करना और स्वावलंबी समाज निर्माण हेतु आपस में सहयोगपूर्ण वातावरण का निर्माण करना ।